Jun 22, 2016

बाढ़ का आँखों देखा हाल [flood essay]

बाढ़ का आँखों देखा वर्णन

बाढ़ का आँखों देखा वर्णन

नदी के खेल निराले हैं । कभी सुंदर-सौम्य रूप के आकर्षण से हमें सम्मोहित करती है, तो कभी विकराल चंडी का रूप धारण कर हमें नष्ट-भ्रष्ट करने को तत्पर हो जाती है । सौम्य बहती नदी जब विकट रूप धर बाढ़ बन जाती है,  तब इस प्राकृतिक के इस प्रकोप के सम्मुख समर्पण के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता । ऐसी ही विवशतापूर्ण स्थिति का  सामना मैनें पिछले वर्ष किया था । 

हर वर्ष भाँति पिछले वर्ष जब परीक्षा समाप्त होने पर मैं अपना दादा-दादी से मिलने गाँव गया, तब बरसात का मौसम शुरू हो चूका था । गंगा किनारे बसा हमारा गाँव छोटा-सा है । एक हज़ार कच्चे-पक्के घर हैं । अधिकांश लोग खेती-बाड़ी से जुड़े हैं । गंगा उनकी माँ है, जो उनके खेतों को सींचकर उनका पालन-पोषण करती है । पर उस वर्ष पता नहीं किया नाराज़गी हुई की मैया-चंडी बन गईं । पिछले दो दिन से लगातार वर्षा ने हम सबको घरों में कैद कर रख था । सुबह देखा तो घरों और पानी-ही-पानी है । पहले तो हमने सोचा शायद नलियाँ भर जाने के कारण एस हुआ होगा, किंतु जब पानी का बहाव तेज़ हो गया और पनि का स्तर लगातार बढ़ने लगा तो हम चिंतित में पर गए ।



चारो और हाहाकार मच गया । हरिया काका से पता चला  पास में बना बाँध टूट गया है । जिससे नदी का जल स्तर बढ़ गया है । हम सब जो सामान बचा सकते थे, जल्दी-जल्दी छत के ऊपर बने कमरे में लें आए । निचे नदी का जल तो ऊपर इंद्र देवता का कहर ।  चरों और से घिर चुके थे । वर्षा के कारण कुछ ठीक से दिखाई नहीं  दे रहा था । दादा-दादी के साथ मैं ऊपर छत पर बैठा इस चिंता में मग्न था की देखा एक बड़ी-सी बस बहती हुई आ रही है । फिर तो तो एक-के-बाद-एक  कभी गायें-भैंसे तो कभी गाड़ियाँ बहती हुई दिखाई देनी लगी । चारों ओर हाहाकार मचने लगा । 'बचाओं -बचाओं' की आवाज से दिल दहलने लगा । अभी तक गंगा की धारा हमारे मकान से दूर थी, किंतु छत से उसकी प्रचण्ड धार दिखाई दे रही थी । मेरे देखते-देखते किनारे बने कच्चे मकान टूटकर बहने लगी । हमारे घर से कुछ दूर पर बने पक्के मकान की छत पर लगभग 15-20 स्त्री पुरुष बच्चे सहायता लिए चीख पुकार रहें थे । तभी सामने से एक सेना का स्टीमर आता दखाई दिया । हमने हाथ हिला-हिला कर पास अने का संकेत दिया । जब स्टीमर कुछ दूर तट पर आके रुक तो हम सब पनि को चिर-चिर के स्टीमर के पास अये । दादा जी ने एक पोटली में चना-चबैना रख था, वह भी उनके हाथ से फिसलकर पानी में बाह गया । स्टीमर में बैठे सैनिक चढ़ने में हमें सहारा दिया, उस छत की और बढ़े जिस छत पर लोग चीख-पुकार मचा रहें थे । और हम और स्टीमर वहाँ गए और उन्हें स्टीमर में लिया । स्टीमर हमें दूर पर एक टीले पर ले गए जहां लोग सुरक्षित थे ।

भूक-प्यास, भय-चिंता ने मुझे संज्ञा शून्य बना दिया था । हम सब सन्न पर गए थे । वर्षा थम चुकी थीं, किन्तु गंगा का कहर जारी था । गॉँव की पाठशाला उचाई पर थी, अभी वहां तक बाढ़ का पानी नहीं पंहुचा थ। हम वहां पहुँचे गॉंव की आधी जनता वहां पहुँच चुकी थीं ।  स्टीमर में से हम सब ने रहत सामग्री उतरि। डबलरोटी, बिस्कुट,फल और डिब्बाबंद खाद्य-सामग्री की उतरना था की लोग उस पर टूट पड़े । दूसरों का पेट भरने वाला किसान आज खुद भूखा था । ऐसे ही दो दिन हो गए । कितने ही लोगो ने पिछले दो दिन से कुछ खाया पिया नहीं ।  जैसे-जैसे हमने कुछ खाया-पिया तो जान-में-जन आई , चारो तरफ उदासी छा राखी थी ।

बाढ़ का आँखों देखा वर्णनचारो ओर मरघटी शांति थी । सूरज के साथ-साथ लोगों के दिल भी दुब रहे थे । भविष्य अंधकारमय था । स्टीमर से अये सामग्री पता नहीं कितने दिन चल पाएगा । जिस्म चलती-फिरती लाश जैसे थी, वे समझ नहीं पा रहें थे की जीवित रहने का ख़ुशी मनाए या लूट जाने का मातम । लगभग एक सप्ताह हो गए स्वयंसेवी संथाओं के सहारे जीते रहें । बाढ़ का पनि उतरा और शहर से आई पहली बस से हम यानि (दादा-दादी) साथ शहर अपने घर लौटे । बाढ़ का यह भयानक दृश्य जब सामने आता है रूह काँप उठती है । मुझे सोचने पर विवश करती है की ज्ञान-विज्ञान  प्रगति का हमारा गर्व कितना उचित हैं

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