Apr 29, 2016

एक प्रसिद्ध साहित्यकार - मुंशी प्रेमचंद की जीवनी (Munsi Premchand)

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मुंशी प्रेमचंद की जीवनी
मुंशी प्रेमचंद का जन्म वाराणसी जिले के लमही गाँव में सन् 1880 में हुआ। उनका मूल नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। उनके पिता डाकखाने में एक नौकरी करते थे। उनकी माँ बचपन में ही चल बसी इसलिए उनका बचपन घोर संकटों में बीता। उनके पिता ने फिर दूसरी शादी भी की। और जब प्रेमचंद की उम्र लगभग 15 साल थी तभी उनके पिता जी का भी देहांत हो गया।

मुंशी प्रेमचंद ने भी अपने जीवन में दो  शादियाँ की। पहली शादी उनके सौतेले नाना ने करवाई। उनकी पहली पत्नी विवाद के कारण उन्हें छोड़कर चली गयी। फिर काफी समय बाद उन्होंने दूसरी शादी एक विधवा औरत के साथ की। जिसका नाम शिवरानी देवी था।

उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा वाराणसी में ग्रहण की। बचपन में एक मौलाना से उर्दू और फ़ारसी का ज्ञान लिया।  मेट्रिक करने के बाद वे आध्यापन कार्य करने लगे। फिर उन्होंने स्वाध्याय करके बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे सरकारी नौकरी में भी रहे। वे महात्मा गांधी जी से बहुत प्रभावित थे। इसीलिए असहयोग आन्दोलन के समय नौकरी से त्यागपत्र  दे दिया।

लेखन कार्य में तो वे लगभग 13 वर्ष की उम्र से ही सक्रिय रहे। प्रेमचंद ने अपना लेखन कार्य उर्दू में नबाबराय नाम से आरम्भ किया, बाद में वे हिन्दी में लिखने लगे। उनकी पहली कहानी सन् 1915 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई।

मृत्यु - सन् 1936 में प्रेमचंद जी बीमार रहने लगे और उनकी मृत्यु हो गयी।

प्रेमचंद का रचनात्मक और संपादन कार्य। 

कहानी संग्रह - उनके जीवन काल में उनकी कहानियाँ विभिन्न संग्रहों के नामों से छपी। उनके मरने के बाद आंकी सभी कहानियों को मानसरोवर (आठों भागो में) संग्रह के नाम से आठ भागों में प्रकाशित कर दिया गया।
उनका सबसे पहले प्रकाशित होने वाला कहानी संग्रह वतन था। जिसका नाम था - सोजे वतन। सोजे वतन का हिंदी में मतलब होता है - राष्ट्र का विलाप या देश का दर्द। इस कहानी संग्रह ने उसे ज़माने में खूब धूम मचाई थी। क्योंकि यह संग्रह देशभक्ति की कहानियों का संग्रह था।

इस कहानी संग्रह का अंग्रेजी शासन पर इतना प्रभाव पड़ा कि उन्हें इस पर रोक लगानी पडी। और साथ में प्रेमचंद जी को न लिखने के लिए कहा। इसी घटना के बाद से प्रेमचंद जी ने अपना नाम नवाबराय से बदलकर हमेशा के लिए प्रेमचंद कर लिया।

उपन्यास - सेवासदन, कर्मभूमि, रंगभूमि, निर्मला, गबन, गोदान, प्रेमाश्रम।
गोदान उनका सबसे ज्यादा प्रसिद्ध उपन्यास है।
नाटक - कर्बला, संग्राम, प्रेम की देवी।
निबंध या लेख संग्रह - विविध प्रसंग (तीन भागों में), कुछ विचार।
संपादन कार्य - माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण।

शिल्पगत विशेषताएँ

प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में किसानों, दलितों एवं नारियों की वेदना तथा वर्ण-व्यवस्था की कुरीतियों का मानवीय चित्रण किया है। वे साहित्य को सामाजिक परिवर्तन का सशक्त साधन मानते थे। उनकी दृष्टि में साहित्यकार समाज के भवन को गिरता नहीं है बल्कि उसका निर्माण करता है। उन्होंने समाज-सुधार और राष्ट्रीय भावना को अपनी रचनाओं में स्थान दिया। कथा-संगठन एवं चरित्र-चित्रण की दृष्टि से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं।

भाषा

प्रेमचंद की रचनाओं की भाषा सजीव, मुहावरेदार और बोलचाल वाली है। इसमें उर्दू की स्वच्छता, गति और मुहावरे से साथ संस्कृत भावमयी पदावली का भी सुन्दर प्रयोग है। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों और उपन्यासों से हिंदी को लोकप्रिय बनाया।

हिंदी में बाल-मनोविज्ञान से सम्बंधित कहानियाँ बहुत कम लिखी गयी है। प्रेमचंद उन दुर्लभ कथाकारों में से हैं जिन्होंने पूरी प्रमाणिकता तथा तन्मयता से साथ बाल-जीवन को अपनी कहानियों में स्थान दिया। उनकी सम्पूर्ण साहित्य भारत की साझी संस्कृति व ग्रामीण जीवन के विविध रंगों से भरा पड़ा हैं।

मुंशी प्रेमचंद के जीवन पर आधारित कार्यकर्म । 

यह कार्यक्रम उपन्यास सम्राट प्रेमचंद्र के जीवन पर आधारित है। (कथा सम्राट-प्रेमचंद  Duration 25 min)

यह कार्यक्रम  हिंदी और उर्दू के उपन्यास लेखक, कहानी लेखक और नाटककार मुंशी प्रेमचंद के जीवन पर आधारित है। (प्रेमचंद का बचपन और बच्चों की कहानियाँ  Duration 25 min) 

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