Dec 6, 2017

मानवता मरी नहीं है -Humanity is not dead | by Saurabh Kumar Devrale

manavta mari nahi hai yar- by sourabh kumar devralay

मानवता मरी नहीं है। 

कुछ ही दिन हुए  थे। मुझे इस बड़े शहर में आये हुए मैं बहुत ही अकेला महसूस करता था, इस शहर में सब कुछ होते हुए भी मुझे एक अकेलापन सा महसूस होता था। मैं जब भी घर से कोचिंग के लिए निकलता, तो मैं देखता ना कोई बोलने वाला, ना कोई पूछने वाला, ना किसी की सहायता करना, ना किसी से बात करना, यही शायद बड़े शहरों की विशेषताएं होती है।मुझे ऐसा लगता है कि मानो यहां पर मानवता मर ही चुकी है।

फिर मैं रोज ही की तरह अपने समय पर कोचिंग के लिए जा रहा था वही सुनसान उस दिन भी मेरे दिमाग में यही बातें चल रही थी मैं यही सोच रहा था कि मानवता तो मर ही चुकी है इस शहर में और शायद यही बड़े शहरों की विशेषताएं होती होगी क्योंकि इससे पहले मैं किसी बड़े शहर में नहीं रहता था बल्कि एक छोटे से गांव से आया था फिर मैं उसी दिन शाम को घर लौट रहा था।

तब बस स्टेशन पर एक बुजुर्ग दादा अस्वस्थ थे पैरों से विकलांग थे चल नहीं पा रहे थे एक तरफ उनके व्हील चेयर पर बैठे हुए थे। बोर्ड को नहीं देख पा रहे थे उस भीड़ में जहां पर बसों का समय लिखा होता था उस दिन उन्होंने एक बालक से पूछा "कि बेटा सिलिकॉन सिटी की बस कब आएगी" तब उसने जवाब दिया "क्या मैं आपको कंडक्टर दिखता हूं जो बताऊं,  कौन की बस कब आएगी" मैं भी पीछे खड़ा कर सुन रहा था मुझे यह सुन बड़ा ही दुख हुआ मुझसे रहा ना गया मैं खुद ही पहुंच गया और कह दिया कि "दादा सिलिकॉन सिटी की बस आने ही वाली है" शायद मुझे देखते ही एक और अंकल वहां पर आ गए और वह भी पूछते हैं "आपको कहां जाना है" मैंने कहा "इनको सिलिकॉन सिटी जाना है" 

फिर उस अंकल और मैंने उस बस का इंतजार किया और जब तक हम दादा के पास ही बैठे रहे हमने देखा कि हमारी सारी गतिविधियां अन्य लोग देख रहे हैं टकाटकी लगाएं जैसे ही बस आती है हम दोनों चिंतित हो जाते हैं क्योंकि  हमें लगा कि आज भी रोज की तरह बस में चढ़ने के लिए धक्का-मुक्की होगी पर पर हम आज का नज़ारा देख आश्चर्यचकित हो गए कि जब बस आती है तो रोज की तरह धक्का-मुक्की नहीं होती और वही लड़का जो पहले अभद्रता से बात कर रहा था बोलता है "दादा जी आप ही पहले चले जाइए बस में फिर हम सब चढ़ जाएंगे" और सभी लोग उस दिन बड़े ही आराम से बस में  चढ़ने के बाद भी सीट के लिए लड़ाई झगड़ा नहीं किया तब मुझे लगा की मानवता मरी नहीं है वो अभी छुप गयी है जिसे धुढना होगा। 
सत्य घटना पर आधारित 
लेखक - सौरभ कुमार देवराले 
खिरकिया

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